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परिचय

आज उम्र के 57 वर्ष का जीवनकाल कैसे गुजरा इस पर द्र्ष्टिपात करने पर कभी-कभी सुखानुभूति व कभी दुःखद अनुभूति होती है। वस्तुतः जब मानव जीवन के उददेश्यों की समझ आई तो अनुभव किया कि दशाधिक वर्षों का जीवन निरर्थक ही चला गया। 40 वर्ष की आयु भरण पोषण के उपक्रम में ही निरर्थक ही चले गये।

अपने जीवन का शैशवकाल सामान्य यदु वंश में पैदा होने के कारण परिश्रमिक वातावरण से ओतपोत रहा है। शिक्षा की दिशा में आज के परिद्रश्य को देखते हुए कोई विशेष महत्व नही था। सामान्य शिक्षा प्रणाली की शिक्षा के तहत उच्चतर माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा प्राप्त की। यौवन अवस्था में आते ही अभिभावकों द्वारा पारिवारिक दायित्वों का बोध करते हुये जीवन में एक नवीन परिवर्तन जीवनसाथी के रूप में अनुभव किया।

पीढी दर पीडी चली आ रही कस्तकारी परम्परा का निवहन करते हुए 5 वर्ष का समय व्यतीत हुआ ! परन्तु पारिवर से मानसिक सामान्जय स्थपित न होने के कारण वह रास न आया और् शहर की तरह स्ख करते हुए अपने को एक महाजन की सेवा मे सेवारत हो गये ! प्रथमतः उस महाजन दारा भी शायद दिव्य सताओ की इच्छा यही थी कि उसके द्वारा हरिदार मे कार्य हेतु जाने का सुअवसर प्रदान किया ! परन्तु तब तक पात्रता विकसित नही थी उस सता के आधीनस्थ हो उसके सहचर बनने की ,जिसे आज अनुभव करते है तो यह चिरतार्थ लगता है कि 'फ़ल समय आने पर ही पकता है और उसके पान करने वाले को पोषन प्रदान करता है"!

वास्तविक जीवन तो लगभग 12 वर्ष पुर्व से जीना प्रारंभ किया। इसके पूर्व की संचय की प्रव्रत्ति थी। जो हमें स्थिर नहिं बैठनें नही दे रही थी। पहले यही सोंचा करता था कि क्या करूँ, कैसे धन कमाऊँ यही झंझावत में कितना समय गंवा दिया इसका ज्ञान अब होता है। पश्चाताप होता है कि कैसी मनोव्रत्ति लिये मैं भाग रहा था। नश्वरता की ओर तीव्रता से भागता मैं शाश्वत को पाना चाह रहा था।

गायत्री परिवार का अंग बनने से पूर्व मेरी शुगर 275 और बी.पी. 180 और पाइल्स आदि कई बीमारियां थी। यादाश्त ऐसी की कुछ याद रखना चाहते परन्तु फिर भी भूल जाते थे। हमारे पारिवारिक चिकित्सक ने सलाह दी कि खीरा और चना ही खाएं उसी से सब कुछ नियंत्रित हो जायेगा। ब्लडप्रेशर की मात्र एक गोली वह भी कुछ समयावधि हेतु प्रावधानित की। इसी बीच गायत्री परिवार के गुरुभाई या यूँ कहें कि गुरु पाठक जी ने गायत्री मंत्र से दीक्षित करते हुए बताया कि गायत्री मंत्र जीवन में निश्चित स्थान, समय व अवधि तक जपें लिखें या मनन करें। हमने उनका अनुपालन किया और आशातीत लाभ पाया। बीमांरियाँ तो शरीर से ऐसे निकल गई जैसे कभी थी ही नहीं। अनवतर 90 दिन का अनुष्ठान 24 घंटे में निश्चित समय, निश्चित स्थान अस्वाद भोजन नियमानुसार भावपुर्वक मंत्र लेखन ने जो प्रज्ञा का प्रकाश जीवन में फैलाया, जो कभी या कष्ट हमें असह्य लगता था कभी प्रसाद सा स्वादिष्ट अनुभुती प्रदान करने लगा। अपूर्णता से पूर्णता का बोध होने लगा।

इस अनुभूति और आनन्द ने वह बोध कराया जो कि यह तो आज के अध्यात्म में वास्तविकता एवं महती आवश्यकता है। पं.श्रीराम शर्मा आचार्य जी की जीवनशैली को अपने जीवन में उतारने, उनके द्वारा कहे को करने का बीडा उठाने का संकल्प ले चल पडे वास्तविक मंजिल की तरफ। साधना की वास्तविकता जो कि अन्नमय कोश की शुद्धता के बिना संभव नही हमें समझ में आ गई और उसे अपने जीवन में उतार सधना के अनेकानेक चरणों को नियमतः चरणबद्ध तरीके अपनाया। जिस कारण हमने अपने को आचार्य श्री के प्रखर प्रहरी व गायत्री के सफल साधक के रूप में शीशे की तरह पारदर्शी और जल की तरह निर्मलता प्रदान की जिसके फलस्वरूप ही 20 अगस्त 2010 को मिशन के मुखिया एवं वरिष्ठों के जीवनक्रमों और दैनिकचर्यायों को पास से देखा तो ह्रदय द्रवित हो करुण पुकार करने लगा कि इनसे यह जानना जरूरी है कि यह वरिष्ठ जिन्हे आचार्य श्री ने मिशन की बागडोर दी ऐसा क्यों कर रहे हैं तो इन्हे बगलें झांकते हुये पाया। पत्राचार का उपक्रम शुरू किया तो जो मिशन एक पोस्टकार्ड पर अपनी प्रतिक्रिया सभी को देता था हमें कोई भी जवाब न दे सका क्योंकि हमारे द्वारा वास्तविकता का आइना दिखाया गया था।

हमारा उददेश्य आचार्य श्री के सपनों को साकार करना ही रहा है, वस्तुतः जिसे जीवनशैली को अपनाकर परमपुज्य ने परिवार रूपी मिशन का गठन किया। वहाँ की स्थिती यह है की वरिष्ठ मिशन का उपयोग अपने लिये कर रहे हैं ना कि अपना उपयोग मिशन के लिये। इस शैली को बदलने की पहल का शंखनाद करने की प्रेरणा मिली क्योंकी पीडा थी कि मिशन जिसे गायत्री के सिद्ध साधक ने अपनी तपःऊर्जा से निर्मित पोषित किया, अपने पथ से भ्रमित हो रहा है। विगत 3 वर्षों डा. प्रणव सहित सभी वरिष्ठों से अन्तः मे उठ रहे सवालों को पूछा कोई जवाब न मिलने में अंततः एक संकलन पुस्तक रूप में "मिशन का चीरहरण एवं महाकाल की अन्तर्वेदना" भाग-1 का प्रकाशन भी किया जो सभी परीजनों तक पहुंचाई परन्तु जवाब आज भी शून्यता में ही है। अनेकानेक फोन आए, परिजन आए कि यह ठीक नही परन्तु कोई भी हमारे प्रश्नों के जवाब को दे न सका, जो की गायत्री की साधना से हमारे अन्तःकरण में हमें पल-प्रतिपल परेशान कर रहे हैं कि क्या गुरुदेव का सपना पुरा होगा? या उनका यह कहा कि बेटा तुम मेरा काम करो या ना करो मैं काम तो ईंट पत्थरों से भी करवा लूँगा, श्रेय का भागी वही होगा जो अग्रिम श्रेणी में आकर मेरे अनुरूप, अनुकूल बताये कार्यों को मूर्त रूप प्रदान करेगा। इसी क्रम में यह हमारा एक और् प्रयास....प्रयास....प्रयास